चट्टानों के निचे दबे दबे बीज का गीत मुझे यहाँ तक सुनाई देता है अचरझ यही है के "सुनाई देता है" इतनी रिक्तता नहीं है मुझमे, ना हीं स्वप्नों के जख्मोपर मैंने चाँद रौशनी का मरहम लगाया है खाली हो जाऊ ये सोचता रहा मगर गलियारा मै बनता चला गया. सापभी गुजरा जुगनूभी, व्योम बढ़ता चला गया। कई दिनोंके बाद मैंने देखा है चट्टान टूट चुकी है, पौधा लहरा रहा है। हरे झंडेकी की विजय लाल बिखर रहा है। मै रहा जो का त्यों पता नहीं अबतक क्या बुनता रहा मफलर ही है बीतें दिनोंका बोझ बादल का हटा नहीं था।