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Showing posts from November, 2018

बोझ

चट्टानों के निचे दबे दबे बीज का गीत  मुझे यहाँ तक सुनाई देता है अचरझ यही है के "सुनाई देता है"   इतनी रिक्तता नहीं है मुझमे,  ना हीं स्वप्नों के जख्मोपर मैंने  चाँद रौशनी का मरहम लगाया है खाली हो जाऊ ये सोचता रहा  मगर गलियारा मै बनता चला गया.  सापभी गुजरा जुगनूभी, व्योम बढ़ता चला गया।   कई दिनोंके बाद मैंने देखा है चट्टान टूट चुकी है, पौधा लहरा रहा है।  हरे झंडेकी की विजय लाल बिखर रहा है।  मै रहा जो का त्यों  पता नहीं अबतक क्या बुनता रहा  मफलर ही है बीतें दिनोंका  बोझ बादल का हटा नहीं था।