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Showing posts from September, 2018

बस तुम्हारा नाम है

एक उषा स्वप्न लेकर क्या चला मै मेरे हाथोंको शक भरी निगाहोसे ही देखा है आपने। अब समझ नहीं आता मेरा मुझपर यकीं कब अपाहिज हुआ और आपकी आखे कब बड़ी। अगर दोष देता हूँ खुद को या आरोंको फिर भी अंततः मै ही दोषी! मै ही हूँ जो भटका! डूबते सीमांत का बासी परिचय मुझको दोहरा जाता बिलकुल गुमनाम फिर भी मै चलता हूँ क्योकि लक्षहीन नहीं है उजाला कंटकाकीर्ण है पथ भलेही, पराभव एक भी नहीं मै भुला।  क्रांति के बिना कोई और शब्द नहीं है पवित्र मेरे लिए और तेरा नाम ही है जो मेरे वजूद का तारा बने  कोण साथ है मेरे ? ना भाग्य ना धन ना मित्र ना परिवार बस तुम्हारा नाम है, जिसे पुकारता हूँ मै, या ओर कोई और मेरी पहचान तुम्हारे नाम से कर देता है, मै जिन्दा क्षणोके चिनगारिसा फिर तेज कदम बढ़ता हूँ हे अनंत मै तुम्हारी तरफ बढ़ता हूँ। चिर काल के आँधियारें को शब्दकिरण लिखता हूँ। 

जीर्णोद्धार

ये अलग बात है हर उफनकर आने वाली बात लिखकर रखना जरुरी नहीं मगर जब विवेक से झुलसता तोफ का गोला बार बार मर्म पर धड़कता है तब लिखना ही पड़ता है मेरी मज़बूरी मुझे खुद को ही सहन करना है क्योकि सहन करने का मूक अभिनयही मैंने सीखा है। वैसे साहित्य अब सिगरेट के थूट के भांति मसलकर बुझाने से ज्यादा कारगर नहीं रहता। क्योकि हर कोई जानता है तारीफ होने से परे इन्कलाब जिंदाबाद सिर्फ एक क्लीषे है।  अपने मृत्यु से पहले लिखे खतों में भगतसिंग  क्या लिखता है ? क्या आपने पढ़ा है ?  पढ़ा है!, तो क्या आप पर उसका कोई असर है ?  "भावुकता ही सबकुछ नहीं,  वो सब समय अनुसार उस प्रसंगविशेष में ठीक लगता है। "  ये रहा इन प्रश्नोंका चतुर उत्तर !  कोई आपसे पूछे तो आप भी यही बोलना। हमारी जड़ता हमे कितनी स्वीकार्य है?  आरामसे आइनोके बगिचेमे हम उस परिचित को  ऐसे दुर्लक्षित करतें है जैसे हम उसे जानतें ही नहीं।   साधनोंकी सुविधाओं और सुविधाओं के उपभोग में  हम सुख को इस कदर प्यार करतें है की निषेध फिर एक बार सिगरेट का थूट बन जाता है...

रणजीत होसकोटे का लेक्चर

पाना क्या चाहते हो ? किस अर्थ को खोजतें हो दार्शनिक बातें और आदर्शों के पथ्थर वो तराशते है जिन्हे अपने शाष्वत होने का विश्वास हो चूका है। ऐसी लगे कांच के कमरेमे रणजीत होसकोटे का लेक्चर सुहाना लगता है क्यों की अंग्रेजी आपकी साधारण बुद्धि को चीरते हुए पूछती है ये सब अपनी भाषा में बोलता तो ? जरुरी क्या है? दार्षनिकोंके बहस में दिमागमें चलने वालें हस्थमैथुन का आंनद लेना या गरम् बिस्तर खोजना? पेट के आतों में लिपटी हुई भूक या कविता गढ़ने का करतब ? रोज के जीवन में टैक्सी से थूकता आदमी जब नई कमीज खराब कर देता है तो मन उदास होने के पहले बुद्ध को याद करता है. इस लिए नहीं मै अहिंसा का पालन करू, उसकी तरफ  "भोसड़ीके" कह कर चिल्लाने से पहले मै  सोचता हूँ बुद्ध को हम हरा चुके है, हर पर्चे पर वो फेल हो गए है। सारी बातें मौन के परे बताई बुद्धने, मगर वो भी क्षणिक था। मै  भी ख़त्म हो जाऊंगा तो प्रश्नो का जाल बुनते रहना कितना लाजमी है तर्क के बिनाभी तो जी नहीं पता, क्या आदमी है !