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Showing posts from May, 2018

अपने फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन का मै भी इस्तमाल कर रहा हूँ।

सत्ता और राजनीती में रूचि रखने वाले बोहोत से लोग है।  सोशल मीडिया ने उन्हें जो चाहे जैसी चाहे प्रतिक्रियाएं देने का अवसर प्राप्त करवाया है।  तो इस स्वतंत्रता की जय हो।  और सोशल मीडिया पर खुद की प्रतिक्रिया देनेके आलावा औरों के पोस्ट ( पेड मीडिया ) को आगे बढ़ने वालोकी  भी जय हो।  आप किसी भी मत विचार या पार्टी की सराहना करें मगर इन सब में जिन लोगोंने देश के लिए जान दी क्या ऐसे लोगों के तस्वीरों और विचारोंको तोड़ मरोड़कर अपनी बात को रखना आप को उचित लगता है? कुछ लोगोंको हर चीज धर्म और राजनीतीसे जोड़नेमें बोहोत मजा आता है।  मगर क्या आपके जीवन में और बेहतर और कोई विचार नहीं। लोग सोशल मीडिया पर ही आपने विचारों को रखतें है फिर और लोग उसपर कमैंट्स करतें है, लोग इन बातों से एक दूसरों को नाराज करतें है आखिर क्या पातें है ? जो सच आपको बताया जा रहा है आप कैसे तय करतें है की वही सच है।  आपके प्रोफइल को कोई देख रहा है, कोई आप के साधारण जीवन के साधारण बताओं का फायदा उठाया जारहा है, आप पर कई चीजे थोपी जा रही है और आपके विचार भी बदले जा रहें है।  ये सोशल मीडिया का सच...

एक और चक्र व्यूह

उस स्क्रीन पर काले काले हिलते धब्बे तुम हो! ये आश्चर्य है| ये निश्चित ही हमारा सृजन काल है| डॉक्टर के दरवाजे पर लिखा है यहां लिंग जाँच मना है। उन्होंने बताया है ये सातवा महीना है मुझे कृष्ण के आठवे होने की याद आती है। अब बेबी साफ सुन सकता है और आँखे खुली बंद कर सकता है आप आपने बेबी से खूप बाते करो, फिरसे कृष्ण और अभिमन्यु झलकते है। आधा अंधेरा है, आधा उजाला है इस प्रसन्न बेला में रह-रहकर उठती है एक हरी मितली-सी, रक्त के समंदर से लाना है अमृतकलश! तुम्हारे इन सांसों से कांप-कांप उठते हैं जंगल, दो-दो दिल धड़क रहे हैं तुममे चार-चार होंठों से पी रही हो समंदर! चार-चार आंखों से कर रही हो आंखें चार महाकाल से! क्या कहु अभी जो जन्मा ही नहीं है उससे कहु जीवन सुन्दर है या निर्दय कठोर सब काला दिखाई देता है ये आँखों का दोष नहीं शहर ढका है काले धुवेसे। ये कहु की आने वाले नस्ल के लिए हमने कुछ नहीं रख्खा साफ़ या ये कहु जीवन परीक्षा लेगा हर क्षण चाहे लेनी हो एक सांस मैंने पेशी के गुणाकार को दिया न्याय या श्रृंगार मेरा सम्भोग सा हो गया दूषित मैंने सुंदर सपना देखा फिर से ...

"एकोहऽम बहुस्याम"

एक छोरा था सिर्फ बारा साल का अच्छा है बारा साल का है इसी लिए छोरा है वुमन हॉस्टलके आगे चाय की टपरी पर काम करता है। अकेला मर्द है जो दिवार लांघे बिना दरवाजेसे आ जा सकता है क्योकि ? वही! क्योकि अभी वो बस बारा साल का छोरा है वहासे गुजरता हर कोई उसका दोस्त बनना चाहता है।   हालही में एक ब्रा की तस्करी कर उसने काफी मुनाफा कमाया है। वो हमेशा कहता है बाहर दिखने वाली सुन्दर लड़की इस बिल्डींगके भीतर भी सुन्दर होती है वो तो ये कम्बख्त दीवारे है जो उनके राज खोल देती है।   अंतर वस्त्रो के आलावा हर किसी के पास छुपाने के लिए कुछ न कुछ है। शायद यही बाते औरत को सुन्दर बनाती है हर आशिक चाहता कुछ और ही है, बस उसे इंसानो की भाषा में प्यार कहता है।   शर्मिष्ठा २०४ वाली उसे जरा ज्यादा ही पसंद है, वो हमेशा उसे टिप देती है क्यों न हो वो एक वर्किंग वूमन जो है। औरोंकी तरह शर्मिष्ठाके भी दो चार आशिक है, जो बाइक पर आते है या टॅक्सीसे आतें है हॉस्टल के सामने चाय पीतें है और निकल जाते है।   वो लड़के शर्मिस्ठा के बारे में पूछते चायवाला छोरा उन्हें सारी उलटी सीध...