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"एकोहऽम बहुस्याम"

एक छोरा था सिर्फ बारा साल का
अच्छा है बारा साल का है इसी लिए छोरा है
वुमन हॉस्टलके आगे चाय की टपरी पर काम करता है।
अकेला मर्द है जो दिवार लांघे बिना दरवाजेसे आ जा सकता है
क्योकि ? वही! क्योकि अभी वो बस बारा साल का छोरा है
वहासे गुजरता हर कोई उसका दोस्त बनना चाहता है।  

हालही में एक ब्रा की तस्करी कर उसने काफी मुनाफा कमाया है।
वो हमेशा कहता है
बाहर दिखने वाली सुन्दर लड़की इस बिल्डींगके भीतर भी सुन्दर होती है
वो तो ये कम्बख्त दीवारे है जो उनके राज खोल देती है।  
अंतर वस्त्रो के आलावा हर किसी के पास छुपाने के लिए कुछ न कुछ है।
शायद यही बाते औरत को सुन्दर बनाती है
हर आशिक चाहता कुछ और ही है, बस उसे इंसानो की भाषा में प्यार कहता है।  

शर्मिष्ठा २०४ वाली उसे जरा ज्यादा ही पसंद है, वो हमेशा उसे टिप देती है
क्यों न हो वो एक वर्किंग वूमन जो है।
औरोंकी तरह शर्मिष्ठाके भी दो चार आशिक है,
जो बाइक पर आते है या टॅक्सीसे आतें है
हॉस्टल के सामने चाय पीतें है और निकल जाते है।  
वो लड़के शर्मिस्ठा के बारे में पूछते
चायवाला छोरा उन्हें सारी उलटी सीधी बातें बताता
टिप लेता और चुप चाप सब देखता रहता। 

एक दिन चाय वाले ने एक अपनी दुकान पर
एक पोस्टर टांगा पैंटी के विज्ञापन का और उसके निचा लिखा
"खुल जा सिम सिम" 
तय था शर्मिस्ठा की चीजे भी चोरी हो रही थी, ये आम नहीं था.
गर्ल्स हॉस्टल में कानाफूसी का यही नया विषय था।
और अचानक छोरेने शर्मिस्ठासे पूछा
आपका बॉयफ्रेंड नहीं है ? क्या आपको कोई नहीं मिला ?
लडके मिले - पर कैसे-कैसे -
ज्ञानी नहीं, पंडिताऊ,
वफ़ादार नहीं, दुमहिलाऊ,
साहसी नहीं, केवल झगड़ालू,
दृढ़ प्रतिज्ञ कहाँ, सिर्फ जिद्दी,
प्रभावी नहीं, सिर्फ हावी,
दोस्त नहीं, मालिक,
सामजिक नहीं, सिर्फ एकांत भीरु
धार्मिक नहीं, केवल कट्टर
चाय वाला कहने लगा
अच्छा ये सब तो मुझे समझ नहीं आया
मुझे देख कर आपको क्या लगता है ?
शर्मिष्ठा ते उस छोरेको गले लगाया
और कहा तू बोहोत अच्छा है
मगर अभी तो तुझे खुद को समझना है
और फिर औरत कोभी
फिर ये पूछने आना मुझसे. 
चायवाले छोरेने कहा
मगर मै जानता हूँ खुदको
और जानना चाहता हूँ औरत को
फिर तुम क्यों दूर रहना चाहती हो ? 
शर्मिस्ठा ने कहा तुम्हारी भी वही इच्छा!
"एकोहऽम बहुस्याम"
 किसीने सृष्टि-रचना के आरम्भ में भी एक से अनेक होने की कामना की – “एकोह्म बहुस्याम”
उसदिन श्रीकृष्णके चित्र को देख बस कुछ सोचती रही.
दिन थमा नहीं गुजरता रहा     
चाय वाला छोरा आता रहा शर्मिस्ठा टिप देती रही. 
गर्ल्स हॉस्टल में ऐसेही चोरिया होती रही.

श्रीकांत पुराणिक 

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