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कोई नहीं सुनता

शब्द कितने है ?
टहनीपर लगे सूखे पत्तों से
झर जातें है अहसाँस
किसी बात का कोई तर्क
किसी तर्क के कोई समंध
अर्थहीन संवाद कितने शुष्क है।

कविता तुम आम जिंदगीके
कितना आगे चली गई हो ?
बाजार में खड़ा इंसान
आलू प्याजके भाव के बहस
से बढ़कर कुछ और सुनना नहीं चाहता।
जनता हूँ वो व्यस्त है और त्रस्त भी है।

सच तो यह है जो सुनकर समझना नहीं चाहता
वो शब्दचातुर्यसे दूसरोंको बेज़ुबान कर देता है,
पूंजी की लालसा ने उसके
पंचेंद्रियोंमे जो जहर घोल दिया है ,
जिसमे इंसान की आखे पिली
जीभ तेज और त्वचा निर्लज्जता की परत ओढ़
पसीने की जगह मवाद उगल रही है।

“मै” का साम्रज्य इतना बड़ा है
जो ना आहुतिका रक्त पहचानता है
न राख का सम्पतिपण।
शायद यही माया है      
कान किसके लिए खोले
और जुबानको कब फिसलना है
मतिष्क भाषसे इतना तो सिखही चूका है।























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