एक उषा स्वप्न लेकर क्या चला मै
मेरे हाथोंको शक भरी निगाहोसे ही देखा है आपने।
अब समझ नहीं आता मेरा मुझपर यकीं
कब अपाहिज हुआ और आपकी आखे कब बड़ी।
अगर दोष देता हूँ खुद को या आरोंको
फिर भी अंततः मै ही दोषी! मै ही हूँ जो भटका!
डूबते सीमांत का बासी परिचय
मुझको दोहरा जाता बिलकुल गुमनाम
फिर भी मै चलता हूँ क्योकि लक्षहीन नहीं है उजाला
कंटकाकीर्ण है पथ भलेही, पराभव एक भी नहीं मै भुला।
क्रांति के बिना कोई और शब्द नहीं है पवित्र मेरे लिए
और तेरा नाम ही है जो मेरे वजूद का तारा बने
कोण साथ है मेरे ?
ना भाग्य
ना धन
ना मित्र
ना परिवार
बस तुम्हारा नाम है,
जिसे पुकारता हूँ मै,
या ओर कोई और मेरी पहचान
तुम्हारे नाम से कर देता है,
मै जिन्दा क्षणोके चिनगारिसा
फिर तेज कदम बढ़ता हूँ
हे अनंत मै तुम्हारी तरफ बढ़ता हूँ।
चिर काल के आँधियारें को
शब्दकिरण लिखता हूँ।
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