सोच रहा हूँ अगर प्रकाश की जगह रेत फेकने लगे लैंप पोस्ट और हवा खुद ही निगलने लगे शब्द भाषा का काम खत्म होते होते भूक लगें मगर कागजोसे अपच भी ना हो सम्भोग से पहेले राजनेता के भाषण सुनने का ट्रेंड होगा घुटनेके निचेसे जंघोंकी समझदार चिकनी सतहोंपर जो जहर बहेगा इमली की चटनी और दही के रंग का हमारे साहस की धजिय्या उधेड़ देगा। दीमकोंसे पिस्सुओं की पैदाइश होते होते कोई समझ लेगा क्या खुदबखुद ? वो सारा ! अफवाह की साँस लेता इंसान झूठ के मासपेशियोंका वो गुथा है जिसे वो खुदही लताड़ता है और खुदही जाकर पकड़ लेता है। सोच रहा हूँ खानेमे आये कंकरपे तिलमिलाए हुए आदमी के खानेमे दही, शहद, घी सब हो, तो क्या स्वादपर एकमत होगा ? कपड़ों की लाचारी अब रही नहीं ऐसा नहीं मगर नग्नता गहना बनता जा रहा है सोने के भाव से चड्डियाँ बेची जा रही है। लज्जा के अलावा स्वतंत्रा की खुदकी व्याख्या प्रजातंत्र पर इतनी हावी है की जैसे गुग्गे की वाणी उसके गले में मसाला तलती है। कांच की बोतल में कैसे फिट हो जाता है लकड़ी का वो जहाज? इसी कुतूहल मै और मुझ जैसे ज्यादा सोचनेवाले जिंदगी को अभ्यास...