Skip to main content

इमली की चटनी और दही

सोच रहा हूँ अगर प्रकाश की जगह रेत फेकने लगे लैंप पोस्ट
और हवा खुद ही निगलने लगे शब्द
भाषा का काम खत्म होते होते
भूक लगें मगर कागजोसे अपच भी ना हो
सम्भोग से पहेले राजनेता के भाषण सुनने का ट्रेंड होगा
घुटनेके निचेसे जंघोंकी समझदार चिकनी सतहोंपर जो जहर बहेगा
इमली की चटनी और दही के रंग का 
हमारे साहस की धजिय्या उधेड़ देगा।
दीमकोंसे पिस्सुओं की पैदाइश होते होते
कोई समझ लेगा क्या खुदबखुद ? वो सारा !
अफवाह की साँस लेता इंसान झूठ के मासपेशियोंका
वो गुथा है जिसे वो खुदही लताड़ता है
और खुदही जाकर पकड़ लेता है।

सोच रहा हूँ खानेमे आये कंकरपे तिलमिलाए हुए आदमी के
खानेमे दही, शहद, घी सब हो, तो क्या स्वादपर एकमत होगा ?
कपड़ों की लाचारी अब रही नहीं ऐसा नहीं मगर नग्नता गहना बनता जा रहा है
सोने के भाव से चड्डियाँ बेची जा रही है।
लज्जा के अलावा स्वतंत्रा की खुदकी व्याख्या प्रजातंत्र पर इतनी हावी है
की जैसे गुग्गे की वाणी उसके गले में मसाला तलती है।

 कांच की बोतल में कैसे फिट हो जाता है लकड़ी का वो जहाज?
इसी कुतूहल मै और मुझ जैसे ज्यादा सोचनेवाले जिंदगी को
अभ्यास का विषय बनाने में लगे है ऐसा फकीर कहता तो  है।
वो बीड़ी फुकता  है, गाली देता  है |
सोचता हूँ वो गाली सबके समझमें आ जाए तो ?
क्या बूढ़ा जिन्दा बचेगा ?
और उसे मारके क्या कोहरा हटेगा ? 

Comments

Popular posts from this blog

बस तुम्हारा नाम है

एक उषा स्वप्न लेकर क्या चला मै मेरे हाथोंको शक भरी निगाहोसे ही देखा है आपने। अब समझ नहीं आता मेरा मुझपर यकीं कब अपाहिज हुआ और आपकी आखे कब बड़ी। अगर दोष देता हूँ खुद को या आरोंको फिर भी अंततः मै ही दोषी! मै ही हूँ जो भटका! डूबते सीमांत का बासी परिचय मुझको दोहरा जाता बिलकुल गुमनाम फिर भी मै चलता हूँ क्योकि लक्षहीन नहीं है उजाला कंटकाकीर्ण है पथ भलेही, पराभव एक भी नहीं मै भुला।  क्रांति के बिना कोई और शब्द नहीं है पवित्र मेरे लिए और तेरा नाम ही है जो मेरे वजूद का तारा बने  कोण साथ है मेरे ? ना भाग्य ना धन ना मित्र ना परिवार बस तुम्हारा नाम है, जिसे पुकारता हूँ मै, या ओर कोई और मेरी पहचान तुम्हारे नाम से कर देता है, मै जिन्दा क्षणोके चिनगारिसा फिर तेज कदम बढ़ता हूँ हे अनंत मै तुम्हारी तरफ बढ़ता हूँ। चिर काल के आँधियारें को शब्दकिरण लिखता हूँ। 

कोई नहीं सुनता

शब्द कितने है ? टहनीपर लगे सूखे पत्तों से झर जातें है अहसाँस किसी बात का कोई तर्क किसी तर्क के कोई समंध अर्थहीन संवाद कितने शुष्क है। कविता तुम आम जिंदगीके कितना आगे चली गई हो ? बाजार में खड़ा इंसान आलू प्याजके भाव के बहस से बढ़कर कुछ और सुनना नहीं चाहता। जनता हूँ वो व्यस्त है और त्रस्त भी है। सच तो यह है जो सुनकर समझना नहीं चाहता वो शब्दचातुर्यसे दूसरोंको बेज़ुबान कर देता है, पूंजी की लालसा ने उसके पंचेंद्रियोंमे जो जहर घोल दिया है , जिसमे इंसान की आखे पिली जीभ तेज और त्वचा निर्लज्जता की परत ओढ़ पसीने की जगह मवाद उगल रही है। “मै” का साम्रज्य इतना बड़ा है जो ना आहुतिका रक्त पहचानता है न राख का सम्पतिपण। शायद यही माया है       कान किसके लिए खोले और जुबानको कब फिसलना है मतिष्क भाषसे इतना तो सिखही चूका है।

जमूरे का स्वागत गीत ( मरहम नाटक से )

जमूरे का स्वागत गीत ( मरहम नाटक से ) स्वागत स्वागत स्वागत ! आइये आइये आइये ! ७० एम एम इस्टमन कलर में आँखे फाडके पैजामे के नाडे  को तंग करने वाली प्यार, तकरत , चार  ऑटम सॉन्ग, दो रेप सीन और मारधाड़ से भरपूर , सामाजिक पारिवारिक ,जवानी दीवानी कर देने वाली कहानी का सनेमा नहीं है  ( उदास हो कर) याने  गए पैसे पानी में दरसल नहीं, मुझे लगता है ये खेल एक सर्कस की तरह होना चाहिए मगर मै पहले ही बता दू की ये खेल बस "खेला" है तमाशा है! घोड़े हाथी का नहीं, न खम्बेसे लिपटती नग्न बालाए है. है रोज के सवाल जवाब रोज़ का यह सवाल, 'कहिए! अब कैसे हैं?' रोज़ का यह जवाब-- ठीक हूँ! सिर्फ़ कमज़ोरी थोड़ी खाँसी और तनिक-सा... यहाँ पर... मीठा-मीठा दर्द! खेल का क्या खास आकर्षण ? मेरे पास उत्तेजित होने के लिए कुछ भी नहीं  हैं . न मेरे पास किसी पोर्न स्टार की तस्वीरें है न युद्ध की बाते, न गद्देदार बिस्तर, न टांगे, न रात, ना चांदनी कुछ भी नहीं हैं, ये दरसल रंगमच भी नहीं है ( दीखता है बस, सच नहीं है) इस चौकोन के मुख्य प्रवेश-द्वार के ...