भव्य स्मारक बन रहे है बुतोंके कद बढ़ रहे है वो सारे डर रहे है कितनी उचाइसे आदर्शों के सिर गिर रहे है। चौराहे पे खड़े बुत लुप्त होने लगे है चबूतरे बाकि है, शिल्पकी आत्माभी मुक्त हो कर उड़ चुकी है। तोड़े गए या किनारे करदिये और कुछ सहजता से भुलादिये गए शहरके शुशोभन में काम तो आये, बुत ये सोच कर मुस्कुरा रहे है। जाते जाते मकानोपे लिखे नारे मिटा रहें है भ्रमित है उनके नाम पर कोई कुछ भी कह रहा है। अब कबूतरों और कावोंपर भी क्या घुस्सा करे अपने तरीकेसे सब निसर्गविधिही तो कर रहें है। कुछ बुत नाराज है जिन्हे अग्नि परीक्षा देनी है आपने त्यागकी विश्वस्तता प्रमाणीत करनी है। क्या ये सपनोका वयस्क लोकतंत्र है जिसके लिए कुर्बानिया दी? क्या ये आजदी गाली है जो संसद के भीतर कविता की तरह सुनाई देती है ?