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Showing posts from August, 2018

"बुत "

भव्य स्मारक बन रहे है बुतोंके कद बढ़ रहे है वो सारे डर रहे है कितनी उचाइसे आदर्शों के सिर गिर रहे है। चौराहे पे खड़े बुत लुप्त होने लगे है चबूतरे बाकि है, शिल्पकी आत्माभी मुक्त हो कर उड़ चुकी है।  तोड़े गए या किनारे करदिये और कुछ सहजता से भुलादिये गए शहरके शुशोभन में काम तो आये, बुत ये सोच कर मुस्कुरा रहे है। जाते जाते मकानोपे लिखे नारे मिटा रहें है भ्रमित है उनके नाम पर कोई कुछ भी कह रहा है। अब कबूतरों और कावोंपर भी क्या घुस्सा करे अपने तरीकेसे सब निसर्गविधिही तो कर रहें है। कुछ बुत नाराज है जिन्हे अग्नि परीक्षा देनी है आपने त्यागकी विश्वस्तता प्रमाणीत करनी है। क्या ये सपनोका वयस्क लोकतंत्र है जिसके लिए कुर्बानिया दी? क्या ये आजदी गाली है जो संसद के भीतर कविता की तरह सुनाई देती है ?

रस्सी पर करतब

रस्सी पर करतब करना क्या होता है ? ये तो वो जानता है जिसके पैरे बचपन में खास तरीकेसे बंधे जातें है। मगर उचाई से जो दिखाई देता है उसे समझने की कला कोई कही नहीं सिखाता। हर तरीके का आदमी जिन्दगीमे कमसे कम एक तरीके की रस्सी पर चलनेकी चेष्ठा करता है, हर एक को उचाई से एक तरीकेका कचरा दिखाई देता है और निचे आतें ही वो आशा नाम का तोता पलता है जो कहता है सब कुछ बदलेगा , अच्छा होगा आखों पर पट्टी बांध लो तो अंधेरे की दुनिया और असलियत का फर्क वो मिटाते चलता है। कहता है सब बढ़िया है। मै रस्सी पार करता हूँ उस हिलते रस्सी से जनता हूँ ना मै संतुलित हूँ न मेरे निचे दिखाई देने वाली भ्रम की दुनिया देखा ये है डेमोक्रेसी- प्रजातंत्र ? खाक!  यहाँ न कोई प्रजा है न कोई तंत्र है, यह तो आदमी का आदमी के खिलाफ षड्यंत्र है. और अगर ये यंत्र है तोआप पूछेंगे ये क्या बनता है ? ये न प्लास्टिक के खिलोने बनता है न शक्कर की गोलियां बनता है मशीन का हर हिस्सा दरसल सबको ज्यादा से ज्यादा ये बेवकूफ बनता है. मैंने भीड़ को झुण्ड ही जाना है.   इस रस्सीपर करतब करना ज्यादा...

जमूरे का स्वागत गीत ( मरहम नाटक से )

जमूरे का स्वागत गीत ( मरहम नाटक से ) स्वागत स्वागत स्वागत ! आइये आइये आइये ! ७० एम एम इस्टमन कलर में आँखे फाडके पैजामे के नाडे  को तंग करने वाली प्यार, तकरत , चार  ऑटम सॉन्ग, दो रेप सीन और मारधाड़ से भरपूर , सामाजिक पारिवारिक ,जवानी दीवानी कर देने वाली कहानी का सनेमा नहीं है  ( उदास हो कर) याने  गए पैसे पानी में दरसल नहीं, मुझे लगता है ये खेल एक सर्कस की तरह होना चाहिए मगर मै पहले ही बता दू की ये खेल बस "खेला" है तमाशा है! घोड़े हाथी का नहीं, न खम्बेसे लिपटती नग्न बालाए है. है रोज के सवाल जवाब रोज़ का यह सवाल, 'कहिए! अब कैसे हैं?' रोज़ का यह जवाब-- ठीक हूँ! सिर्फ़ कमज़ोरी थोड़ी खाँसी और तनिक-सा... यहाँ पर... मीठा-मीठा दर्द! खेल का क्या खास आकर्षण ? मेरे पास उत्तेजित होने के लिए कुछ भी नहीं  हैं . न मेरे पास किसी पोर्न स्टार की तस्वीरें है न युद्ध की बाते, न गद्देदार बिस्तर, न टांगे, न रात, ना चांदनी कुछ भी नहीं हैं, ये दरसल रंगमच भी नहीं है ( दीखता है बस, सच नहीं है) इस चौकोन के मुख्य प्रवेश-द्वार के ...