रस्सी पर करतब करना क्या होता है ?
ये तो वो जानता है जिसके पैरे बचपन में खास तरीकेसे बंधे जातें है।
मगर उचाई से जो दिखाई देता है उसे समझने की कला
कोई कही नहीं सिखाता।
हर तरीके का आदमी जिन्दगीमे कमसे कम
एक तरीके की रस्सी पर चलनेकी चेष्ठा करता है,
हर एक को उचाई से एक तरीकेका कचरा दिखाई देता है
और निचे आतें ही वो आशा नाम का तोता पलता है
जो कहता है
सब कुछ बदलेगा , अच्छा होगा
आखों पर पट्टी बांध लो तो अंधेरे की दुनिया और असलियत का
फर्क वो मिटाते चलता है।
कहता है सब बढ़िया है।
मै रस्सी पार करता हूँ उस हिलते रस्सी से जनता हूँ
ना मै संतुलित हूँ न मेरे निचे दिखाई देने वाली भ्रम की दुनिया
देखा ये है डेमोक्रेसी- प्रजातंत्र ?
खाक! यहाँ न कोई प्रजा है न कोई तंत्र है,
यह तो आदमी का आदमी के खिलाफ षड्यंत्र है.
यह तो आदमी का आदमी के खिलाफ षड्यंत्र है.
और अगर ये यंत्र है तोआप पूछेंगे ये क्या बनता है ?
ये न प्लास्टिक के खिलोने बनता है
न शक्कर की गोलियां बनता है
मशीन का हर हिस्सा दरसल
सबको ज्यादा से ज्यादा ये बेवकूफ बनता है.
मैंने भीड़ को झुण्ड ही जाना है.
इस रस्सीपर करतब करना ज्यादा मुश्किल है या कोई सरकारी काम
ये मै समझ नहीं पता, हा इतना पता है
रिश्वत नाम की काली बिल्ली से डरने वाला हर आदमी
रिश्वत नाम की काली बिल्ली से डरने वाला हर आदमी
आपने घर में रोज उसी बिल्ली को दूध पिलाता है।
जेब में स्मार्ट फ़ोन रखता है और सड़क पर थूकता फिरता है
जब कुछ साल विदेश रहता है तो NRI कहलाता है और फिर उसे
लायसन्स मिल जाता है की वो आपने शहर को खुले आम गाली दे। मैंने भीड़ को झुण्ड ही जाना है.
इस बेरहम झुण्ड का क्या मै भी हिस्सा बनु?
रस्सी पर ही चलता रहूँ या ये खम्बे ही उखड फेकू? पता नहीं
सम्भ्रम है. जिसमे और कितनेही शब्द सुनाई देते है
जनतंत्र, देश, सीमा,
हड्डी, खून, कीमा,
शासन, सुरक्षा, शान्ति
भूकम्प, बाढ़, आंधी
परमाणु बम्ब, शांति यात्रा, काले गुलाब
लाल सलाम, कुल्हड़, देसी शराब,
विस्पोट, मौते, कत्ल,
आग, पत्थर, धुँआ
राख खाक राख खाक राख खाक राख खाक राख खाक
फुुुउउ …
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