लक्षहीन दुरी का उजला भटकाव निस्तीर्ण विसर्जित बहिर्मुख क्षितिज कटाव अतृप्त आकांशाओसे के जूते घिसे जातें है घासपर तीखे समझौते पीकर पड़ा है आकाश खाटपर। चहरेपे उभरे है नक्शेसे आकार, पुराने दोस्त कहने लगे है कितने बदल गए हो श्रीमान जमींपर रहनेकी जिद और मिट्टीसे अलगाव दोनों तो नहीं है संभव ? दोष दिए जारहें है और स्वीकार किये जारहें है मुकता सज्जन बने रहनेकी आश्रित सुजान लज्जित होरही है बड़े मसूडोंकी मुस्कान निम् से कड़वा दिखावटी प्यार औपचारिकता से गले लगता है यार। बोहोत दिनोंबाद गांव आय हूँ सड़के याद दिलाती है मोड़ किसी दरवाजेसे बचकर निकता हूँ किसी दरवाजे के भीतर जानेसे डरता हूँ नाराजगी भूलनेकी नसीहत दहलीज देती है “कर्तव्य पार करो” वो कहता है मुड़कर फर्ज वो करता है पूरा दूसरोंका फर्ज याद दिलाकर।