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Showing posts from July, 2019

बोहोत दिनोंबाद गांव आय हूँ

लक्षहीन दुरी का उजला भटकाव निस्तीर्ण विसर्जित बहिर्मुख क्षितिज कटाव अतृप्त आकांशाओसे के जूते घिसे जातें है घासपर तीखे समझौते पीकर पड़ा है आकाश खाटपर। चहरेपे उभरे है नक्शेसे आकार, पुराने दोस्त कहने लगे है कितने बदल गए हो श्रीमान जमींपर रहनेकी जिद और मिट्टीसे अलगाव दोनों तो नहीं है संभव ? दोष दिए जारहें है और स्वीकार किये जारहें है मुकता सज्जन बने रहनेकी आश्रित सुजान लज्जित होरही है बड़े मसूडोंकी मुस्कान निम् से कड़वा दिखावटी प्यार औपचारिकता से गले लगता है यार। बोहोत दिनोंबाद गांव आय हूँ सड़के याद दिलाती है मोड़ किसी दरवाजेसे बचकर निकता हूँ किसी दरवाजे के भीतर जानेसे डरता हूँ  नाराजगी भूलनेकी नसीहत दहलीज देती है “कर्तव्य पार करो”  वो कहता है मुड़कर फर्ज वो करता है पूरा दूसरोंका फर्ज याद दिलाकर।

ब्ल्याकबोर्ड और मेरा पोर्ट्रेट

आज क्लास के  ब्ल्याकबोर्डपर मैंने बनाया था एक ड्रॉइंग गमले का जिसमे फूल लगा है। खिडकीके के बहारभी एक गमला है, जो सूखा है। और अचानक चिल्लाकर शाल्मली कहती है, सर आपने बनाया चॉकसे वो फूल वैसाही फूल खिल आया है मेरे बालोंमे। छोटीसी कुर्सीपर बैठ ऊँचे मेजपर उसने बनाया था स्टैंडिंग लाइन स्लीपपिंग लाइन वाला एक सदा सरल चित्र और मेरा चहरा गोल आँखे दो बिंदु राइट के निशानसे छोटीसी नाक और स्माइली लिप्स। मैंने इतना सुन्दर पहलीबार अपने आपको देखा था मैंने पहलीबार अपनी स्माइलकी सम्भावनाको इतना बड़ा पाया था।

कोई नहीं सुनता

शब्द कितने है ? टहनीपर लगे सूखे पत्तों से झर जातें है अहसाँस किसी बात का कोई तर्क किसी तर्क के कोई समंध अर्थहीन संवाद कितने शुष्क है। कविता तुम आम जिंदगीके कितना आगे चली गई हो ? बाजार में खड़ा इंसान आलू प्याजके भाव के बहस से बढ़कर कुछ और सुनना नहीं चाहता। जनता हूँ वो व्यस्त है और त्रस्त भी है। सच तो यह है जो सुनकर समझना नहीं चाहता वो शब्दचातुर्यसे दूसरोंको बेज़ुबान कर देता है, पूंजी की लालसा ने उसके पंचेंद्रियोंमे जो जहर घोल दिया है , जिसमे इंसान की आखे पिली जीभ तेज और त्वचा निर्लज्जता की परत ओढ़ पसीने की जगह मवाद उगल रही है। “मै” का साम्रज्य इतना बड़ा है जो ना आहुतिका रक्त पहचानता है न राख का सम्पतिपण। शायद यही माया है       कान किसके लिए खोले और जुबानको कब फिसलना है मतिष्क भाषसे इतना तो सिखही चूका है।

चार

सुबह दादर ब्रिज पर वेस्टर्न से सेंट्रल और हार्बर से वेस्टर्न पैर चल रहें है। लोकल समय से है ये घडिया बता रही है। भीड़ या झुण्ड जो गुजर रही है ये बस बेबाक खड़ा फूल बेचनेवाला अंतर समझ रहा है। अधनंगा आदिवासी सुसभ्य ग्राहक को जंगली फूल बेंच रहा है। दोपहर साफ आसमान पिली धुप , देड़सो मंजिलाना इमारत से चालीसवीं मंजिलपर लटकता इंसान कांच पोछता है , ऐसा नहीं की परछाई वाले सारे बादल रूखे सूखे हो मगर हसता तब है जब पैरोंके निचेसे हवाईजहाज निकलता दिखाई देता है। शाम   आटा बेलने वाले हाथ कोयले को शाम के सूरजसा सुलगा रहें है, मैदा है या आटा है, रोटियां गोलही बना रहा है, थकान, निगलने चबाने या गटकजाने से अनजान है दांतवाले जबडोंको खोला जा रहा है, होठ जुबान के साथ बंद किये जा रहैं है। भूक का इलाज क्या किसी मजहब या किसी किताब में खोजे जा रहा है? दिमाग सुन्न है, होर्डिंगपर मॉडल बादलों में छुप रही है एक हाथसे प्लेट साफ़ करता है दूसरे हाथ से प्यान्टकी ज़िप ठीक कर रहा है। रात तीन दिनसे आया नहीं तू खोलीपे एक यार दूसरे से पूछता है दूसरा मु...