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चार

सुबह
दादर ब्रिज पर
वेस्टर्न से सेंट्रल और हार्बर से वेस्टर्न
पैर चल रहें है।
लोकल समय से है
ये घडिया बता रही है।
भीड़ या झुण्ड
जो गुजर रही है
ये बस बेबाक खड़ा फूल बेचनेवाला
अंतर समझ रहा है।
अधनंगा आदिवासी सुसभ्य ग्राहक को
जंगली फूल बेंच रहा है।

दोपहर
साफ आसमान पिली धुप ,
देड़सो मंजिलाना इमारत से चालीसवीं मंजिलपर
लटकता इंसान कांच पोछता है ,
ऐसा नहीं की परछाई वाले सारे बादल रूखे सूखे हो
मगर हसता तब है जब पैरोंके निचेसे हवाईजहाज
निकलता दिखाई देता है।

शाम  
आटा बेलने वाले हाथ
कोयले को शाम के सूरजसा सुलगा रहें है,
मैदा है या आटा है, रोटियां गोलही बना रहा है,
थकान, निगलने चबाने या गटकजाने से अनजान है
दांतवाले जबडोंको खोला जा रहा है,
होठ जुबान के साथ बंद किये जा रहैं है।
भूक का इलाज क्या किसी मजहब या किसी किताब में खोजे जा रहा है?
दिमाग सुन्न है, होर्डिंगपर मॉडल बादलों में छुप रही है
एक हाथसे प्लेट साफ़ करता है दूसरे हाथ से प्यान्टकी ज़िप ठीक कर रहा है।

रात
तीन दिनसे आया नहीं तू खोलीपे
एक यार दूसरे से पूछता है
दूसरा मुस्कुराकर कहता है, रात में नया काम मिला है
वा बेटा! दुगनी कमाई, साले किसपे उडाता है ?
वो कहता है, रूम का किराया दस तारीख तक दूंगा
और कब्रिस्तानकी दिवार फांदकर चला जाता है।



































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बस तुम्हारा नाम है

एक उषा स्वप्न लेकर क्या चला मै मेरे हाथोंको शक भरी निगाहोसे ही देखा है आपने। अब समझ नहीं आता मेरा मुझपर यकीं कब अपाहिज हुआ और आपकी आखे कब बड़ी। अगर दोष देता हूँ खुद को या आरोंको फिर भी अंततः मै ही दोषी! मै ही हूँ जो भटका! डूबते सीमांत का बासी परिचय मुझको दोहरा जाता बिलकुल गुमनाम फिर भी मै चलता हूँ क्योकि लक्षहीन नहीं है उजाला कंटकाकीर्ण है पथ भलेही, पराभव एक भी नहीं मै भुला।  क्रांति के बिना कोई और शब्द नहीं है पवित्र मेरे लिए और तेरा नाम ही है जो मेरे वजूद का तारा बने  कोण साथ है मेरे ? ना भाग्य ना धन ना मित्र ना परिवार बस तुम्हारा नाम है, जिसे पुकारता हूँ मै, या ओर कोई और मेरी पहचान तुम्हारे नाम से कर देता है, मै जिन्दा क्षणोके चिनगारिसा फिर तेज कदम बढ़ता हूँ हे अनंत मै तुम्हारी तरफ बढ़ता हूँ। चिर काल के आँधियारें को शब्दकिरण लिखता हूँ। 

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