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जमूरे का स्वागत गीत ( मरहम नाटक से )

जमूरे का स्वागत गीत ( मरहम नाटक से )

स्वागत स्वागत स्वागत !
आइये आइये आइये !
७० एम एम इस्टमन कलर में
आँखे फाडके पैजामे के नाडे  को तंग करने वाली
प्यार, तकरत , चार  ऑटम सॉन्ग, दो रेप सीन
और मारधाड़ से भरपूर , सामाजिक पारिवारिक ,जवानी दीवानी कर देने वाली
कहानी का सनेमा नहीं है  ( उदास हो कर)
याने  गए पैसे पानी में
दरसल नहीं, मुझे लगता है ये खेल एक सर्कस की तरह होना चाहिए
मगर मै पहले ही बता दू की
ये खेल बस "खेला" है
तमाशा है!
घोड़े हाथी का नहीं,
न खम्बेसे लिपटती नग्न बालाए है.
है रोज के सवाल जवाब
रोज़ का यह सवाल, 'कहिए! अब कैसे हैं?'
रोज़ का यह जवाब-- ठीक हूँ! सिर्फ़ कमज़ोरी


थोड़ी खाँसी और तनिक-सा... यहाँ पर... मीठा-मीठा दर्द!
खेल का क्या खास आकर्षण ?
मेरे पास उत्तेजित होने के लिए
कुछ भी नहीं  हैं .
न मेरे पास किसी पोर्न स्टार की तस्वीरें है
न युद्ध की बाते,
न गद्देदार बिस्तर,
न टांगे, न रात,
ना चांदनी
कुछ भी नहीं हैं,
ये दरसल रंगमच भी नहीं है ( दीखता है बस, सच नहीं है)
इस चौकोन के मुख्य प्रवेश-द्वार के सामने
हर मौसम आकर ठिठक जाता है
सड़क के उस पार
चुपचाप दोनों हाथ
बगल में दबाए
साँस रोके
ख़ामोश
इमली की शाखों पर हवा
बैठी रहती है. न बहती है, न तूफान आता है।

क्रांति !
कोन बोला ये ? कोन बिच में चिल्लाया ?
चिड़िया घर के शेर में कितना शेर बचा होता है,
ये जनना चाहते है आप?
आओ १५ अगस्त और २६ जनवरी को !
मील तो गई आजादी और क्या चाहिए ?
चिल्लाने लगे क्रांति, क्रांति !

अबे "क्रांति" पॉपकॉर्न के लिफाफे पर गलतीसे छापा गया
अंडरवेअर का देसी लेबल है.
और आजादी क्या है? ये एक दूसरे को चुप करते,
चीखते, चिल्लाते सांसदोंसे पूछो ?
या पूछो उन युवा आशिकोंसे जो बच्चोंके बगिचेमें
बेकाबू कामवेग को झाडियोंमें छुपातें है।
  
यहां से मै  कितना भी चिल्लाऊ
दर्शक नाम के सिंदूर लगे पथ्थर पर
किसी चीज का कोई असर होता ही नहीं है.
सहज है दर्शक दर्शन के भुखे बिलकुल भी नहीं है।
फिर पूछता हूँ चाहतें हो ये खेल देखना ?
तो मै पहले ही बता दु।, इस चौकोन में
न मुन्नी है न पैरों  है

चौकोन  के अन्दर
एक ही ऋतु
हर उस उजाले के स्वप्न में बारहों मास
हर रात रोती काली बिल्ली
हर दिन
प्रयोगशाला से बाहर फेंकी हुई
रक्तरंजित सुफ़ेद
खरगोश की लाश है.
के बहहत्तर साल बाद भी डेमोक्रेसी! ,
समय से पहले पैदा हुआ लावारिस  भ्रूण है.
अपनी फॉरेन्सिक जाँच की रहस्यमय स्थिति से
मुक्त होने के इन्तज़ार में  आकाश की तरफ ऊँगली उठाये आदमी के बूत के पीछे
संविधान के रखरखाव और मरम्मत के इंतजार में है.

हर कोई आरक्षण चाहता है क्योकि
बैसाखी होना राजनीती खेलनेकी
प्रार्थमिक आवश्यकता है।

कानून सही या गलत का निर्णय लेता ही नहीं
या तो वो अगली तारीख की उलटी करता है,
या राजनीती के गोबर को लोगोके दिवार पर लीपने में लग जाता है.

ये कोण आया ? मेरी टिप्पणी से आपके अंदर का दार्शनिक जाग गया ?
इस सब का विरोध करने के लिए आवाज खोजने लगा!
आप अभी आये?
आप आओगे ये पता था मगर इतनी देर बाद ?
खेल ख़त्म नहीं हुआ है अभी
मगर आपसे से पूछना चाहता हूँ की आप
केवल दर्शक हो या टोरेरो ?  
(स्पेन के बुलफाइटर)
जो इस कूबड़ वाले जानवर का
पूर्णतः अंत करेंगे।
और कहोगे भारत तेरे टुकड़े होंगे !
तालिया !
मेरे पीठ पर भी ऐसा ही एक कूबड़ है
जिसको ढोना मेरा अनजाना आनंद बन चूका है
और उसे काट फ़ेकनेका खयाल कविता गढ़ने जैसा है.
हा! मगर आओ आपका स्वागत है.
आइये आइये आइये!
स्वागत स्वागत स्वागत !

खुला हुआ दरवाजा देखकर
तुम तो चले आए,
पर मैं अँधेरे का आदी,
अकर्मण्य...निराश...
तुम्हारे आने का खो चुका था विश्वास।
कितने मुद्दों पर "क्यों" और "क्या"
और न जाने क्या , क्या सवाल लेकर आये ! वाह !
पर तुम आए हो--स्वागत है!
स्वागत!..
वैसे आप देर से आये है
बोहोत समय बित चूका है,
यहा १९४७ के लूट के  बाद जो कुछ बचा है,
उसे निगल जाने के लिए एक पूरा का पूरा परिवार सज्ज था.
और दिमाकोंकी अपनी सेनाएं भी थी.
नक़्शे के पोस्टमार्टम का उत्सव अभी ख़त्म नहीं हुआ है.  
आइये स्वागत है आपका !
कहा ?
यही भाई मेरे इस खेल में,
मेरे इस घर में
जो उम्मीद की ढिबरी से निकलते
धुवे को त्याग का यज्ञ समझता है।
और स्वागत है
घर की इन काली दीवारों पर!
और कहाँ?
हाँ, मेरे बच्चे ने
खेल खेल में ही यहाँ काई खुरच दी थी
आओ--यहाँ बैठो,
और मुझे मेरे अभद्र सत्कार के लिए क्षमा करो।
नहीं, मुझ को नहीं अपने दर्द का अभिमान---


मानता हूँ मैं पराजय है तुम्हारी याद।
जो कह रहा हूँ वो हिंदी में बोल रहा हूँ
ये तुम्हारी भी भाषा है
आशा करता हूँ समझ में आ रही है !
वैसे समझाने के लिए एक अंग्रेज किरायेपे लेना है !
मै भटका नहीं हूँ मेरे गीत से
अख़बार के हाशिये फिसलने पर मजबूर करतें है।
माफ़ करना। स्वागत है!

स्वागत है अजीब पेड़ों से झरे पत्तों पर
जिनका तना जाँघ सा है
टहनियाँ बाँहों-सी, पत्रहीन।
स्वागत स्वागत स्वागत !
मगर मै  एक गीत गाऊँगा
जिससे ये न लगे की मै देश द्रोह की बात  नहीं कर रहा हूँ
और ये भी न लगे की जरा ज्यादा ही देशभक्त हूँ या राष्टवादी, या संघी।

मै सिर्फ प्यार की बात करूँगा और शुद्ध मनोरंजन
देश की स्थितियोका कोई परिणाम मेरे मष्तिक पर नहीं हुआ है !

के नीले-सफ़ेद फूलों के बीच से
गुज़रते हुए भविष्य की पगडण्डियों से
रंगो की तमाम सम्भावनाएँ
छींट दूँगा तुम्हारी
बंजर घोषित ज़मीनों पर
इंकार करते हुए उन तमाम फ़ैसलों से
जिनमें कहा गया कि
हमारी संवेदनाए पुराने दिनों की बात हैं
मैं ला खड़ा करूँगा कठघरे में बतौर गवाह
उन हज़ारों-लाखों प्रेम-पत्रों को
जो समय के विकटतम भागों में लिखे गए
उससे ये तो लगे की प्रेम की ही बात कर रहा हूँ
धर्म भगवान , देश और नीति का परहेज मै याद रखूँगा
और सही में आपके लिए
बिलकुल नया गीत गाऊँगा।
मुझे पता है जमूरे का गीत सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन होना चाहिए
मेरे लिए सौंदर्यशास्त्रियोने बोहोत सरल नियम बनाये !
सामाजिक या राजनैतिक मुद्दों पर गलती से भटका हूँ
माफ़ी चाहता हूँ कदरदान
मगर आया हूँ होश में
मेरा हुक्का उत्तर चूका है
अब होगा खेल - सही मायनो में शुद्ध मनोरंजन !

स्वागत स्वागत स्वागत !

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बस तुम्हारा नाम है

एक उषा स्वप्न लेकर क्या चला मै मेरे हाथोंको शक भरी निगाहोसे ही देखा है आपने। अब समझ नहीं आता मेरा मुझपर यकीं कब अपाहिज हुआ और आपकी आखे कब बड़ी। अगर दोष देता हूँ खुद को या आरोंको फिर भी अंततः मै ही दोषी! मै ही हूँ जो भटका! डूबते सीमांत का बासी परिचय मुझको दोहरा जाता बिलकुल गुमनाम फिर भी मै चलता हूँ क्योकि लक्षहीन नहीं है उजाला कंटकाकीर्ण है पथ भलेही, पराभव एक भी नहीं मै भुला।  क्रांति के बिना कोई और शब्द नहीं है पवित्र मेरे लिए और तेरा नाम ही है जो मेरे वजूद का तारा बने  कोण साथ है मेरे ? ना भाग्य ना धन ना मित्र ना परिवार बस तुम्हारा नाम है, जिसे पुकारता हूँ मै, या ओर कोई और मेरी पहचान तुम्हारे नाम से कर देता है, मै जिन्दा क्षणोके चिनगारिसा फिर तेज कदम बढ़ता हूँ हे अनंत मै तुम्हारी तरफ बढ़ता हूँ। चिर काल के आँधियारें को शब्दकिरण लिखता हूँ। 

कोई नहीं सुनता

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