सुबह दादर ब्रिज पर वेस्टर्न से सेंट्रल और हार्बर से वेस्टर्न पैर चल रहें है। लोकल समय से है ये घडिया बता रही है। भीड़ या झुण्ड जो गुजर रही है ये बस बेबाक खड़ा फूल बेचनेवाला अंतर समझ रहा है। अधनंगा आदिवासी सुसभ्य ग्राहक को जंगली फूल बेंच रहा है। दोपहर साफ आसमान पिली धुप , देड़सो मंजिलाना इमारत से चालीसवीं मंजिलपर लटकता इंसान कांच पोछता है , ऐसा नहीं की परछाई वाले सारे बादल रूखे सूखे हो मगर हसता तब है जब पैरोंके निचेसे हवाईजहाज निकलता दिखाई देता है। शाम आटा बेलने वाले हाथ कोयले को शाम के सूरजसा सुलगा रहें है, मैदा है या आटा है, रोटियां गोलही बना रहा है, थकान, निगलने चबाने या गटकजाने से अनजान है दांतवाले जबडोंको खोला जा रहा है, होठ जुबान के साथ बंद किये जा रहैं है। भूक का इलाज क्या किसी मजहब या किसी किताब में खोजे जा रहा है? दिमाग सुन्न है, होर्डिंगपर मॉडल बादलों में छुप रही है एक हाथसे प्लेट साफ़ करता है दूसरे हाथ से प्यान्टकी ज़िप ठीक कर रहा है। रात तीन दिनसे आया नहीं तू खोलीपे एक यार दूसरे से पूछता है दूसरा मु...