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बोहोत दिनोंबाद गांव आय हूँ

लक्षहीन दुरी का उजला भटकाव
निस्तीर्ण विसर्जित बहिर्मुख क्षितिज कटाव
अतृप्त आकांशाओसे के जूते घिसे जातें है घासपर
तीखे समझौते पीकर पड़ा है आकाश खाटपर।

चहरेपे उभरे है नक्शेसे आकार, पुराने दोस्त
कहने लगे है कितने बदल गए हो श्रीमान
जमींपर रहनेकी जिद और मिट्टीसे अलगाव
दोनों तो नहीं है संभव ?
दोष दिए जारहें है और स्वीकार किये जारहें है
मुकता सज्जन बने रहनेकी आश्रित सुजान
लज्जित होरही है बड़े मसूडोंकी मुस्कान
निम् से कड़वा दिखावटी प्यार
औपचारिकता से गले लगता है यार।

बोहोत दिनोंबाद गांव आय हूँ
सड़के याद दिलाती है मोड़
किसी दरवाजेसे बचकर निकता हूँ
किसी दरवाजे के भीतर जानेसे डरता हूँ 
नाराजगी भूलनेकी नसीहत दहलीज देती है
“कर्तव्य पार करो”  वो कहता है मुड़कर
फर्ज वो करता है पूरा दूसरोंका फर्ज याद दिलाकर।

















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बस तुम्हारा नाम है

एक उषा स्वप्न लेकर क्या चला मै मेरे हाथोंको शक भरी निगाहोसे ही देखा है आपने। अब समझ नहीं आता मेरा मुझपर यकीं कब अपाहिज हुआ और आपकी आखे कब बड़ी। अगर दोष देता हूँ खुद को या आरोंको फिर भी अंततः मै ही दोषी! मै ही हूँ जो भटका! डूबते सीमांत का बासी परिचय मुझको दोहरा जाता बिलकुल गुमनाम फिर भी मै चलता हूँ क्योकि लक्षहीन नहीं है उजाला कंटकाकीर्ण है पथ भलेही, पराभव एक भी नहीं मै भुला।  क्रांति के बिना कोई और शब्द नहीं है पवित्र मेरे लिए और तेरा नाम ही है जो मेरे वजूद का तारा बने  कोण साथ है मेरे ? ना भाग्य ना धन ना मित्र ना परिवार बस तुम्हारा नाम है, जिसे पुकारता हूँ मै, या ओर कोई और मेरी पहचान तुम्हारे नाम से कर देता है, मै जिन्दा क्षणोके चिनगारिसा फिर तेज कदम बढ़ता हूँ हे अनंत मै तुम्हारी तरफ बढ़ता हूँ। चिर काल के आँधियारें को शब्दकिरण लिखता हूँ। 

कोई नहीं सुनता

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जमूरे का स्वागत गीत ( मरहम नाटक से )

जमूरे का स्वागत गीत ( मरहम नाटक से ) स्वागत स्वागत स्वागत ! आइये आइये आइये ! ७० एम एम इस्टमन कलर में आँखे फाडके पैजामे के नाडे  को तंग करने वाली प्यार, तकरत , चार  ऑटम सॉन्ग, दो रेप सीन और मारधाड़ से भरपूर , सामाजिक पारिवारिक ,जवानी दीवानी कर देने वाली कहानी का सनेमा नहीं है  ( उदास हो कर) याने  गए पैसे पानी में दरसल नहीं, मुझे लगता है ये खेल एक सर्कस की तरह होना चाहिए मगर मै पहले ही बता दू की ये खेल बस "खेला" है तमाशा है! घोड़े हाथी का नहीं, न खम्बेसे लिपटती नग्न बालाए है. है रोज के सवाल जवाब रोज़ का यह सवाल, 'कहिए! अब कैसे हैं?' रोज़ का यह जवाब-- ठीक हूँ! सिर्फ़ कमज़ोरी थोड़ी खाँसी और तनिक-सा... यहाँ पर... मीठा-मीठा दर्द! खेल का क्या खास आकर्षण ? मेरे पास उत्तेजित होने के लिए कुछ भी नहीं  हैं . न मेरे पास किसी पोर्न स्टार की तस्वीरें है न युद्ध की बाते, न गद्देदार बिस्तर, न टांगे, न रात, ना चांदनी कुछ भी नहीं हैं, ये दरसल रंगमच भी नहीं है ( दीखता है बस, सच नहीं है) इस चौकोन के मुख्य प्रवेश-द्वार के ...