सत्ता और राजनीती में रूचि रखने वाले बोहोत से लोग है। सोशल मीडिया ने उन्हें जो चाहे जैसी चाहे प्रतिक्रियाएं देने का अवसर प्राप्त करवाया है। तो इस स्वतंत्रता की जय हो। और सोशल मीडिया पर खुद की प्रतिक्रिया देनेके आलावा औरों के पोस्ट ( पेड मीडिया ) को आगे बढ़ने वालोकी भी जय हो। आप किसी भी मत विचार या पार्टी की सराहना करें मगर इन सब में जिन लोगोंने देश के लिए जान दी क्या ऐसे लोगों के तस्वीरों और विचारोंको तोड़ मरोड़कर अपनी बात को रखना आप को उचित लगता है? कुछ लोगोंको हर चीज धर्म और राजनीतीसे जोड़नेमें बोहोत मजा आता है। मगर क्या आपके जीवन में और बेहतर और कोई विचार नहीं। लोग सोशल मीडिया पर ही आपने विचारों को रखतें है फिर और लोग उसपर कमैंट्स करतें है, लोग इन बातों से एक दूसरों को नाराज करतें है आखिर क्या पातें है ?
जो सच आपको बताया जा रहा है आप कैसे तय करतें है की वही सच है। आपके प्रोफइल को कोई देख रहा है, कोई आप के साधारण जीवन के साधारण बताओं का फायदा उठाया जारहा है, आप पर कई चीजे थोपी जा रही है और आपके विचार भी बदले जा रहें है। ये सोशल मीडिया का सच हम सब जानतें है फिर भी हम नहीं रुकते।
मैंने भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस के तस्वीरों के साथ ऐसे विचार सोशल मीडिया पर देखे है जो कभी उन्होंने कहा ही नहीं। मैंने वीर सावरकर के कला पानी की तस्वीरों को किसी और चीज की टिपणी करने के लिए इस्तेमाल करतें हुए देखा है।
कभी मौका मिले तो जानिए की भगत सींग के फांसी के बाद उनके देह का क्या किया गया। कभी अंडमान जाईय तो पता करे कालापानी की सजा क्या होती है।
जो लोग इन महान लोगों के विचारों और तस्वीरों के साथ छेडखानी कर रहें है,आपने निजी फायदे के लिए जैसे चाहे वैसे इस्तेमाल क्र रहें है उन्हें अपनी इंसान होने की जाँच कर लेनी चाहिए।
इतिहास मौन है शायद इसी लिए राजनैतिक दल इतिहासकी घटनाओंका, पात्रोंका इस्तमाल आपके भावनाओं के साथ खेलनेके लिए करता है, पढ़े लिखे लोग सोशल मीडिया पर अपना ग़ुस्सा उतरतें है और अनपढ़ सरकारी गाड़ियों और दफ़्तरोंपर।
गरीब आदमी का पूर्ण सत्य तो केवल रोटी ही होती है और इन सब फसादों में सिर्फ उनका नुकसान होता है जिन्हे मोर्चे के लिए ख़रीदा जा सकता है और दंगोंमें जलाया जा सकता है।
हे सोशल मीडिया पर क्रांति और राजनीती की बातें करने वालो अपनी वर्चुअल रिअलिटी से कृपया बहार आओ.
आजादी के बाद मैंने कभी नहीं सुनाकी किसी युवा में इस देशमें किसी अहम् बदलाव के लिए कोई बड़ा नेतृत्व किया। इस मिटटी से क्रांति का खून धुल चूका है क्योकि इस देश के युवा बॉलीवुड में या ज्यादासे ज्यादा अच्छी नौकरी और अच्छी छोकरी पाने में ही व्यस्त है।
जब क्रांति की बात आती है इस देश में गाँधी के बाद बूढ़े अण्णा हजारे को अनशन करते देखा है ( उनके कोई भी मुद्दे हो - उसे भी अलग राजनैतिक रंग दिया ही गया है ) जिन लोगोंको ये लगता है की हम किसी पोस्ट को लिखे या कोई पोस्ट फॉरवर्ड करके फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन का पूर्ण उपयोग कर रहें है तो उन्हें चाहिए की वो आगे आये और बदलाव का नेतृव्त करें।
तो वो तमाम लोग जिन्हे राजनैतिक दलों पर नेताओंपर टिपण्णी करने में सुकून मिलता है उनसे ये अनुरोध है, बिनती है की कृपया अपने खाली समय का उपयोग आप जैसे चाहें करे, बहार की गन्दगी की तरह विचारों की गन्दगी भी फैलाये मगर उसके लिए किसी फ्रीडम फाइटर के नाम से झूठे विचार न फैलाये और ना ही उनकी तस्वीरों साथ कोई छेड़खानी करें।
अंतमें ये याद दिलाना चाहता हूँ स्वातंत्र्य और स्वैराचार में फरक करना समझिये वार्ना ऐसे मंद बुधियोंपर दया ही आती है उसके आलावा कुछ किया भी नहीं जाना चाहिए।
किसी चीज का विरोध करने पर फेसबुक के क्रन्तिकारी ने कहा आप हमे न बताइये की क्या पोस्ट करे क्या नहीं, क्या लिखे क्या नहीं, अब मेरे पास भी अपनी बात रखने का कोई और जरिया नहीं इसी लिए ये पोस्ट कर रहा हूँ, अपने फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन का मै भी इस्तमाल कर रहा हूँ।
जो सच आपको बताया जा रहा है आप कैसे तय करतें है की वही सच है। आपके प्रोफइल को कोई देख रहा है, कोई आप के साधारण जीवन के साधारण बताओं का फायदा उठाया जारहा है, आप पर कई चीजे थोपी जा रही है और आपके विचार भी बदले जा रहें है। ये सोशल मीडिया का सच हम सब जानतें है फिर भी हम नहीं रुकते।
मैंने भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस के तस्वीरों के साथ ऐसे विचार सोशल मीडिया पर देखे है जो कभी उन्होंने कहा ही नहीं। मैंने वीर सावरकर के कला पानी की तस्वीरों को किसी और चीज की टिपणी करने के लिए इस्तेमाल करतें हुए देखा है।
कभी मौका मिले तो जानिए की भगत सींग के फांसी के बाद उनके देह का क्या किया गया। कभी अंडमान जाईय तो पता करे कालापानी की सजा क्या होती है।
जो लोग इन महान लोगों के विचारों और तस्वीरों के साथ छेडखानी कर रहें है,आपने निजी फायदे के लिए जैसे चाहे वैसे इस्तेमाल क्र रहें है उन्हें अपनी इंसान होने की जाँच कर लेनी चाहिए।
इतिहास मौन है शायद इसी लिए राजनैतिक दल इतिहासकी घटनाओंका, पात्रोंका इस्तमाल आपके भावनाओं के साथ खेलनेके लिए करता है, पढ़े लिखे लोग सोशल मीडिया पर अपना ग़ुस्सा उतरतें है और अनपढ़ सरकारी गाड़ियों और दफ़्तरोंपर।
गरीब आदमी का पूर्ण सत्य तो केवल रोटी ही होती है और इन सब फसादों में सिर्फ उनका नुकसान होता है जिन्हे मोर्चे के लिए ख़रीदा जा सकता है और दंगोंमें जलाया जा सकता है।
हे सोशल मीडिया पर क्रांति और राजनीती की बातें करने वालो अपनी वर्चुअल रिअलिटी से कृपया बहार आओ.
आजादी के बाद मैंने कभी नहीं सुनाकी किसी युवा में इस देशमें किसी अहम् बदलाव के लिए कोई बड़ा नेतृत्व किया। इस मिटटी से क्रांति का खून धुल चूका है क्योकि इस देश के युवा बॉलीवुड में या ज्यादासे ज्यादा अच्छी नौकरी और अच्छी छोकरी पाने में ही व्यस्त है।
जब क्रांति की बात आती है इस देश में गाँधी के बाद बूढ़े अण्णा हजारे को अनशन करते देखा है ( उनके कोई भी मुद्दे हो - उसे भी अलग राजनैतिक रंग दिया ही गया है ) जिन लोगोंको ये लगता है की हम किसी पोस्ट को लिखे या कोई पोस्ट फॉरवर्ड करके फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन का पूर्ण उपयोग कर रहें है तो उन्हें चाहिए की वो आगे आये और बदलाव का नेतृव्त करें।
तो वो तमाम लोग जिन्हे राजनैतिक दलों पर नेताओंपर टिपण्णी करने में सुकून मिलता है उनसे ये अनुरोध है, बिनती है की कृपया अपने खाली समय का उपयोग आप जैसे चाहें करे, बहार की गन्दगी की तरह विचारों की गन्दगी भी फैलाये मगर उसके लिए किसी फ्रीडम फाइटर के नाम से झूठे विचार न फैलाये और ना ही उनकी तस्वीरों साथ कोई छेड़खानी करें।
अंतमें ये याद दिलाना चाहता हूँ स्वातंत्र्य और स्वैराचार में फरक करना समझिये वार्ना ऐसे मंद बुधियोंपर दया ही आती है उसके आलावा कुछ किया भी नहीं जाना चाहिए।
किसी चीज का विरोध करने पर फेसबुक के क्रन्तिकारी ने कहा आप हमे न बताइये की क्या पोस्ट करे क्या नहीं, क्या लिखे क्या नहीं, अब मेरे पास भी अपनी बात रखने का कोई और जरिया नहीं इसी लिए ये पोस्ट कर रहा हूँ, अपने फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन का मै भी इस्तमाल कर रहा हूँ।
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