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जीर्णोद्धार

ये अलग बात है
हर उफनकर आने वाली बात लिखकर रखना जरुरी नहीं
मगर जब विवेक से झुलसता तोफ का गोला बार बार मर्म पर धड़कता है
तब लिखना ही पड़ता है
मेरी मज़बूरी मुझे खुद को ही सहन करना है
क्योकि सहन करने का मूक अभिनयही मैंने सीखा है।

वैसे साहित्य अब सिगरेट के थूट के भांति मसलकर
बुझाने से ज्यादा कारगर नहीं रहता।
क्योकि हर कोई जानता है तारीफ होने से परे
इन्कलाब जिंदाबाद सिर्फ एक क्लीषे है। 

अपने मृत्यु से पहले लिखे खतों में भगतसिंग 
क्या लिखता है ? क्या आपने पढ़ा है ?
 पढ़ा है!, तो क्या आप पर उसका कोई असर है ? 
"भावुकता ही सबकुछ नहीं, 
वो सब समय अनुसार उस प्रसंगविशेष में ठीक लगता है। " 
ये रहा इन प्रश्नोंका चतुर उत्तर ! 
कोई आपसे पूछे तो आप भी यही बोलना।

हमारी जड़ता हमे कितनी स्वीकार्य है? 
आरामसे आइनोके बगिचेमे हम उस परिचित को 
ऐसे दुर्लक्षित करतें है जैसे हम उसे जानतें ही नहीं।  
साधनोंकी सुविधाओं और सुविधाओं के उपभोग में 
हम सुख को इस कदर प्यार करतें है की
निषेध फिर एक बार सिगरेट का थूट
बन जाता है, और माथेपे उभरी सिलवटे 
भविष्यका कार्यक्रम निर्धारित करती है। 

मैंने एक से पूछा आसपास की चीजे आपको 
बैचैन नहीं करती ? उसने अचंभित होकर उल्टा 
मुझसे ही प्रश्न किया क्या डॉक्यूमेंट्री बना रहें हो नेटफ्लिक्स के लिए ? 
और सलाह दी की अगली गलीमे नाबालिक वेश्याओं का ठिकाना है। 
उसके बगलमे आमिर ओरतोंको रीझनेके लिए स्पेशल जिगोलो मसाज पार्लर।

एक किसी ने मुझसे पुछा  "तो तूने क्या उखाड़ लिया?" 
मैंने कहा मै भूक और भाषा के बिच के अंतर को दिखता हूँ 
राख दबे चहरों से आँखे खोद कर उनका जीर्णोद्धार करता हूँ।
शुक्र मनाओ मै अभी तक तुम्हे इंसान समझता हूँ।    
   



  





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