पाना क्या चाहते हो ?
किस अर्थ को खोजतें हो
दार्शनिक बातें और आदर्शों के पथ्थर
वो तराशते है जिन्हे अपने शाष्वत
होने का विश्वास हो चूका है।
ऐसी लगे कांच के कमरेमे
रणजीत होसकोटे का लेक्चर
सुहाना लगता है क्यों की अंग्रेजी
आपकी साधारण बुद्धि को चीरते हुए
पूछती है ये सब अपनी भाषा में बोलता तो ?
जरुरी क्या है? दार्षनिकोंके बहस में
दिमागमें चलने वालें हस्थमैथुन का आंनद लेना
या गरम् बिस्तर खोजना?
पेट के आतों में लिपटी हुई भूक
या कविता गढ़ने का करतब ?
रोज के जीवन में टैक्सी से थूकता आदमी
जब नई कमीज खराब कर देता है तो
मन उदास होने के पहले बुद्ध को याद करता है.
इस लिए नहीं मै अहिंसा का पालन करू,
उसकी तरफ "भोसड़ीके" कह कर चिल्लाने से पहले
मै सोचता हूँ बुद्ध को हम हरा चुके है,
हर पर्चे पर वो फेल हो गए है।
सारी बातें मौन के परे बताई बुद्धने, मगर वो भी क्षणिक था।
मै भी ख़त्म हो जाऊंगा
तो प्रश्नो का जाल बुनते रहना कितना लाजमी है
तर्क के बिनाभी तो जी नहीं पता, क्या आदमी है !
किस अर्थ को खोजतें हो
दार्शनिक बातें और आदर्शों के पथ्थर
वो तराशते है जिन्हे अपने शाष्वत
होने का विश्वास हो चूका है।
ऐसी लगे कांच के कमरेमे
रणजीत होसकोटे का लेक्चर
सुहाना लगता है क्यों की अंग्रेजी
आपकी साधारण बुद्धि को चीरते हुए
पूछती है ये सब अपनी भाषा में बोलता तो ?
जरुरी क्या है? दार्षनिकोंके बहस में
दिमागमें चलने वालें हस्थमैथुन का आंनद लेना
या गरम् बिस्तर खोजना?
पेट के आतों में लिपटी हुई भूक
या कविता गढ़ने का करतब ?
रोज के जीवन में टैक्सी से थूकता आदमी
जब नई कमीज खराब कर देता है तो
मन उदास होने के पहले बुद्ध को याद करता है.
इस लिए नहीं मै अहिंसा का पालन करू,
उसकी तरफ "भोसड़ीके" कह कर चिल्लाने से पहले
मै सोचता हूँ बुद्ध को हम हरा चुके है,
हर पर्चे पर वो फेल हो गए है।
सारी बातें मौन के परे बताई बुद्धने, मगर वो भी क्षणिक था।
मै भी ख़त्म हो जाऊंगा
तो प्रश्नो का जाल बुनते रहना कितना लाजमी है
तर्क के बिनाभी तो जी नहीं पता, क्या आदमी है !
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