Skip to main content

रणजीत होसकोटे का लेक्चर

पाना क्या चाहते हो ?
किस अर्थ को खोजतें हो
दार्शनिक बातें और आदर्शों के पथ्थर
वो तराशते है जिन्हे अपने शाष्वत
होने का विश्वास हो चूका है।

ऐसी लगे कांच के कमरेमे
रणजीत होसकोटे का लेक्चर
सुहाना लगता है क्यों की अंग्रेजी
आपकी साधारण बुद्धि को चीरते हुए
पूछती है ये सब अपनी भाषा में बोलता तो ?

जरुरी क्या है? दार्षनिकोंके बहस में
दिमागमें चलने वालें हस्थमैथुन का आंनद लेना
या गरम् बिस्तर खोजना?
पेट के आतों में लिपटी हुई भूक
या कविता गढ़ने का करतब ?

रोज के जीवन में टैक्सी से थूकता आदमी
जब नई कमीज खराब कर देता है तो
मन उदास होने के पहले बुद्ध को याद करता है.
इस लिए नहीं मै अहिंसा का पालन करू,
उसकी तरफ  "भोसड़ीके" कह कर चिल्लाने से पहले
मै  सोचता हूँ बुद्ध को हम हरा चुके है,
हर पर्चे पर वो फेल हो गए है।
सारी बातें मौन के परे बताई बुद्धने, मगर वो भी क्षणिक था।
मै  भी ख़त्म हो जाऊंगा
तो प्रश्नो का जाल बुनते रहना कितना लाजमी है
तर्क के बिनाभी तो जी नहीं पता, क्या आदमी है !

Comments

Popular posts from this blog

बस तुम्हारा नाम है

एक उषा स्वप्न लेकर क्या चला मै मेरे हाथोंको शक भरी निगाहोसे ही देखा है आपने। अब समझ नहीं आता मेरा मुझपर यकीं कब अपाहिज हुआ और आपकी आखे कब बड़ी। अगर दोष देता हूँ खुद को या आरोंको फिर भी अंततः मै ही दोषी! मै ही हूँ जो भटका! डूबते सीमांत का बासी परिचय मुझको दोहरा जाता बिलकुल गुमनाम फिर भी मै चलता हूँ क्योकि लक्षहीन नहीं है उजाला कंटकाकीर्ण है पथ भलेही, पराभव एक भी नहीं मै भुला।  क्रांति के बिना कोई और शब्द नहीं है पवित्र मेरे लिए और तेरा नाम ही है जो मेरे वजूद का तारा बने  कोण साथ है मेरे ? ना भाग्य ना धन ना मित्र ना परिवार बस तुम्हारा नाम है, जिसे पुकारता हूँ मै, या ओर कोई और मेरी पहचान तुम्हारे नाम से कर देता है, मै जिन्दा क्षणोके चिनगारिसा फिर तेज कदम बढ़ता हूँ हे अनंत मै तुम्हारी तरफ बढ़ता हूँ। चिर काल के आँधियारें को शब्दकिरण लिखता हूँ। 

कोई नहीं सुनता

शब्द कितने है ? टहनीपर लगे सूखे पत्तों से झर जातें है अहसाँस किसी बात का कोई तर्क किसी तर्क के कोई समंध अर्थहीन संवाद कितने शुष्क है। कविता तुम आम जिंदगीके कितना आगे चली गई हो ? बाजार में खड़ा इंसान आलू प्याजके भाव के बहस से बढ़कर कुछ और सुनना नहीं चाहता। जनता हूँ वो व्यस्त है और त्रस्त भी है। सच तो यह है जो सुनकर समझना नहीं चाहता वो शब्दचातुर्यसे दूसरोंको बेज़ुबान कर देता है, पूंजी की लालसा ने उसके पंचेंद्रियोंमे जो जहर घोल दिया है , जिसमे इंसान की आखे पिली जीभ तेज और त्वचा निर्लज्जता की परत ओढ़ पसीने की जगह मवाद उगल रही है। “मै” का साम्रज्य इतना बड़ा है जो ना आहुतिका रक्त पहचानता है न राख का सम्पतिपण। शायद यही माया है       कान किसके लिए खोले और जुबानको कब फिसलना है मतिष्क भाषसे इतना तो सिखही चूका है।

जमूरे का स्वागत गीत ( मरहम नाटक से )

जमूरे का स्वागत गीत ( मरहम नाटक से ) स्वागत स्वागत स्वागत ! आइये आइये आइये ! ७० एम एम इस्टमन कलर में आँखे फाडके पैजामे के नाडे  को तंग करने वाली प्यार, तकरत , चार  ऑटम सॉन्ग, दो रेप सीन और मारधाड़ से भरपूर , सामाजिक पारिवारिक ,जवानी दीवानी कर देने वाली कहानी का सनेमा नहीं है  ( उदास हो कर) याने  गए पैसे पानी में दरसल नहीं, मुझे लगता है ये खेल एक सर्कस की तरह होना चाहिए मगर मै पहले ही बता दू की ये खेल बस "खेला" है तमाशा है! घोड़े हाथी का नहीं, न खम्बेसे लिपटती नग्न बालाए है. है रोज के सवाल जवाब रोज़ का यह सवाल, 'कहिए! अब कैसे हैं?' रोज़ का यह जवाब-- ठीक हूँ! सिर्फ़ कमज़ोरी थोड़ी खाँसी और तनिक-सा... यहाँ पर... मीठा-मीठा दर्द! खेल का क्या खास आकर्षण ? मेरे पास उत्तेजित होने के लिए कुछ भी नहीं  हैं . न मेरे पास किसी पोर्न स्टार की तस्वीरें है न युद्ध की बाते, न गद्देदार बिस्तर, न टांगे, न रात, ना चांदनी कुछ भी नहीं हैं, ये दरसल रंगमच भी नहीं है ( दीखता है बस, सच नहीं है) इस चौकोन के मुख्य प्रवेश-द्वार के ...